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योग में नियम व सावधानियां



सभी योगाभ्यासियों के लिये


सभी प्रकार के योगाभ्यासियों को योगाभ्यास सम्बन्धी नियमों, सावधानियों का पालन अवश्य करना चाहिये, नियमों का पालन नही करने से अनेक प्रकार की विकृतियाँ, परेशानिया उत्पन्न हो जाती है, कुछ महत्वपूर्ण ‘नियम-सावधानियाँ’ निम्न है -


1. सामान्य रूप से अभ्यास का समय प्रातः-सायं होता है। वातावरण-स्थान, शाँत, स्वच्छ, हवादार, होना चाहिये, दैनिक क्रिया, शौच, स्नान, आदि से निवृत होकर अभ्यास करना चाहियें। अभ्यास सदैव भूमि, फर्श , छत पर दरी कम्बल बिछाकर करना चाहिये। प्रत्येक अभ्यासों के बीच 2-3 मिनट का विश्राम-अन्तर रखें।


2. अभ्यास का समय प्रारम्भ में 10-15 मिनट हो, इसे बाद में शारीरिक क्षमतानुसार 30 मिनट से 1 घंटे तक कर सकते है नये अभ्यासियों से शीघ्र कोई भी अभ्यास नही होता अतः व्यध्र न होकर अभ्यास करना चाहिये, जिस प्रकार धीरे-धीरे जंगली जानवर वश में होकर अनेक प्रकार के करतब दिखाते है, उसी प्रकार कठिन अभ्यास भी सिद्ध होकर लाभ पहुँचाते है। कभी भी किसी अभ्यास को झटके से, जोर देकर, जल्दबाजी में नही करना चाहिये।


3. पुरूष अभ्यास के समय हाफपैंट, पाजामा, कच्छा, महिलायें साड़ी, सलवार, कुर्ती, स्लैक्स, स्ट्रेचिंग, पैंट-ब्लाउज आदि मौसमानुसार पहन सकते/सकती हैं। वस्त्र सदैव , हल्का होना चाहिये। जिससे अभ्यास में रूकावट न हो। सामान्यतः अभ्यास खाली पेट ही किया जाता है। अभ्यास के पहले थोड़ा पानी अवश्य पीना चाहिये, तथा अभ्यास बाद मूत्र त्याग, इससे शरीर के विजातीय पदार्थ बाहर निकल जाते हैं।


4. योग अभ्यासियों को सदैव सुपाच्य हल्का, अपने पाचन शक्ति के अनुरूप भोजन ग्रहण करना चाहिये। योगाभ्यास के आधे घंटे बाद ही कुछ भोज्य प्रदार्थ लेना चाहिये। मौसमी शाक-सब्जी, फल, इत्यादि का सेवन प्रचुर मात्रा में लेना तथा भोजन में रेशेदार (फाईबर युक्त) प्रदार्थो का सेवन करना चाहिये। अधिक तेल मसाले, मिर्च, भुने, तले, खटाई, अचार आदि प्रदार्थ तथा अल्कोहल, भाँग, गाँजा, बीड़ी, सिगरेट,नशे वाली चीजो का सेवन नही करना चाहिये। पानी का पूर्ण प्रयोग करना चाहिये। भोजन के तुरन्त बाद अभ्यास वर्जित है।


5.प्रातः पूरब, सायं, पश्चिम मूँह करके अभ्यास करना चाहिये, शीतकाल में शीतवर्धक तथा ग्रीष्म ऋतु में उष्ण प्राणायाम नही करना चाहिये। अम्लता (एसीडिटी) बढ़ाने वाले प्रदार्थों का सेवन भूलकर भी नही करना चाहिये।


6. उच्च रक्तचाप, क्षतिग्रस्त रक्तवाहिनियों में रक्त रोकने वाले अभ्यासों को, माँसपेशियों पर लिम्फैटिक ग्लैड आदि पर अधिक दबाव नही देना चाहिये। इसी प्रकार अस्थि विकार, अस्थि-भंग, शल्य होने पर, गंभीर रोग होने पर, गर्भवती अवस्था में,घायलावस्था में बिना चिकित्सक, योग विशेषज्ञ के परामर्श के बिना अभ्यास नही करना चाहिये। किसी भी अभ्यास को प्रारम्भ में 4-5 बार से अधिक न करें, हमेशा सामर्थनुसार ही अभ्यास करें।



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